मेला है। निशानेबाजी का दुकान लगा है। दस का चार गोली छोड़ सकते हैं। सिर्फ चार। महंगाई सिर्फ ऑटो सेक्टर में नहीं है ! आसमान में खो जाने वाला बैलून बीस रुपये का बिक रहा है। आपको दस में सिर्फ पाँच गोलगप्पे मिल पाएंगे। मैं झूले नहीं झूलता तो उसकी कीमत मालूम नहीं है। लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि यदि इतने महंगे मेले जेएनयू में लगाये जाएं तो विरोध नहीं ही होगा !
ख़ैर, मेला में सबसे सही चीज़ होती है पीले रंग की गोली वाली माउज़र ! यहाँ नहीं मिल रही है.. रंग-बिरंगे खाने के स्टॉल नहीं होते तो मेले का मज़ा बर्बाद होने ही वाला था..
"म्मा मुझे घर जाना है !" बहन बोली.. रोने लगी।
इन लोगों को मेला पसंद नहीं है। कुछ है ही नहीं करने लायक.. घर लौट कर मोबाइल में 'लकड़ी की काठी' सुन रही है। अब ठीक है। चुप हो गयी है.. सब नार्मल है। घर के बाहर बहुत शोर था। बाहर का वातावरण पॉल्यूटेड है। धूल उड़ती है.. मेरी बहन सरीखी लड़कियाँ बड़ी होकर जब इंस्टाफेम बनती हैं तो गाँव, पतली सड़कों और मेले का फोटो 'हैशटैग नोस्टाल्जिया, करके अपलोड करती हैं।
मैं भी सोंच रहा हूँ कि अब बाहर न ही जाया जाए.. बाहर है ही क्या ? कुछ भी तो नहीं.. विधायक लोग भी तो आज सुबह-सुबह होटल बुला लिए गए हैं ! मेले का रोमांच खत्म होता जा रहा है.. मेले के आयोजकों ने अब 'सेल्फी पॉइंट' ईजाद किये हैं। मेले के मुख्य द्वार या उससे पहले ही पॉइंट लगाया जाता है। आधे-आधे घंटे पर कपड़े और कनबाले बदल-बदल कर जाएं और तस्वीरें ले कर लौट आएं। मेले में जाने से जुल्फ़ें बिखर जाएंगी.. मैल बैठ जाएगा। कपड़े गंदे हो जाएंगे.. मेले में जाने से आप मानसिक अवसाद में चले जायेंगे.. मेलों में न जाएं। मेले त्याज्य रहें तो बेहतर होगा। जितना वक़्त आप मेलों में बर्बाद करेंगे उतने में आप या तो मेला फ़िल्म देख कर मेले को समझ लें.. या फिर एक-आध 'थर्टीन रिजन्स व्हाय' के एपिसोड देख लें। आपकी शाम क़ायदे से सफल मानी जायेगी।
- मोहित / 24.11.19
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