Monday, November 25, 2019

मेला 2019

मेला है। निशानेबाजी का दुकान लगा है। दस का चार गोली छोड़ सकते हैं। सिर्फ चार। महंगाई सिर्फ ऑटो सेक्टर में नहीं है ! आसमान में खो जाने वाला बैलून बीस रुपये का बिक रहा है। आपको दस में सिर्फ पाँच गोलगप्पे मिल पाएंगे। मैं झूले नहीं झूलता तो उसकी कीमत मालूम नहीं है। लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि यदि इतने महंगे मेले जेएनयू में लगाये जाएं तो विरोध नहीं ही होगा !
ख़ैर, मेला में सबसे सही चीज़ होती है पीले रंग की गोली वाली माउज़र ! यहाँ नहीं मिल रही है.. रंग-बिरंगे खाने के स्टॉल नहीं होते तो मेले का मज़ा बर्बाद होने ही वाला था..
"म्मा मुझे घर जाना है !" बहन बोली.. रोने लगी।
इन लोगों को मेला पसंद नहीं है। कुछ है ही नहीं करने लायक.. घर लौट कर मोबाइल में 'लकड़ी की काठी' सुन रही है। अब ठीक है। चुप हो गयी है.. सब नार्मल है। घर के बाहर बहुत शोर था। बाहर का वातावरण पॉल्यूटेड है। धूल उड़ती है.. मेरी बहन सरीखी लड़कियाँ बड़ी होकर जब इंस्टाफेम बनती हैं तो गाँव, पतली सड़कों और मेले का फोटो 'हैशटैग नोस्टाल्जिया, करके अपलोड करती हैं।
मैं भी सोंच रहा हूँ कि अब बाहर न ही जाया जाए.. बाहर है ही क्या ? कुछ भी तो नहीं.. विधायक लोग भी तो आज सुबह-सुबह होटल बुला लिए गए हैं ! मेले का रोमांच खत्म होता जा रहा है.. मेले के आयोजकों ने अब 'सेल्फी पॉइंट' ईजाद किये हैं। मेले के मुख्य द्वार या उससे पहले ही पॉइंट लगाया जाता है। आधे-आधे घंटे पर कपड़े और कनबाले बदल-बदल कर जाएं और तस्वीरें ले कर लौट आएं। मेले में जाने से जुल्फ़ें बिखर जाएंगी.. मैल बैठ जाएगा। कपड़े गंदे हो जाएंगे.. मेले में जाने से आप मानसिक अवसाद में चले जायेंगे.. मेलों में न जाएं। मेले त्याज्य रहें तो बेहतर होगा। जितना वक़्त आप मेलों में बर्बाद करेंगे उतने में आप या तो मेला फ़िल्म देख कर मेले को समझ लें.. या फिर एक-आध 'थर्टीन रिजन्स व्हाय' के एपिसोड देख लें। आपकी शाम क़ायदे से सफल मानी जायेगी।

- मोहित / 24.11.19

Thursday, November 21, 2019

मैं रेल हूँ।

लोग कहते हैं कि मेरी खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें दिख रही है ओस की बूंद, कुहासे, पीली रोशनी के बीच बिछी चारकोल और उस अलकतरे की लम्बी काया पर खड़े-बिखरे झींगुर और ट्रकें। मेरी खिड़की से अब खेत नहीं दिख रहे हैं। इस पहर को यह वरदान है कि तुम्हें तुम्हारे होने पर कोई किसी को नहीं देख सकता। कोई कुछ नहीं देख सकता। एक ऐसा भी पहर है जिसे यह भ्रम है कि उसे लोग चाहते हैं मगर ऐसा नहीं है। इस पहर में घटनाएं ज्यादा होती हैं। जैसे मतदान इसी पहर में होते हैं, यही पहर चोरों की फ़ेहरिस्त में से राजा तलाश लेती है। चुना गया चोर इसी पहर में अपनी चोरी छोड़ने की झूठी शपथ लेता है। इसी पहर में लोग उस शपथ पर तालियाँ बजाते हैं। ख़ैर, मैं अभी रात के तीन बजे किसी खेत के बीच खींची स्याही पर अपने पैर चला रही हूँ। इस पहर में अमूमन स्त्रियों का घर से बाहर निकलना डरावना माना जाता है। मगर, विवशतावश स्त्रियां अपने-अपने कारणों से निकलती ही हैं। लेकिन मैं अपवाद हूँ। मुझे आधी रात को खेतों में खींची इस स्याही पर दौड़ने का निर्देश है। मैं रेल हूँ।

Tuesday, November 19, 2019

63255 अप पटना-गया पैसेंजर

63255 अप पटना-गया फ़ास्ट पैसेंजर। कल पटना गए हुए थे। कॉरपोरेट बंधुओं से भरी रहने वाली रेलगाड़ी। पटना-गया रेलखंड के जितने भी रोजगारी है सारे इसी से अपने घर लौटते हैं। शाम साढ़े छह बजे के बाद लोग अपनी गोद में गमछे फैला कर ताश जमा देते हैं। कुछ लोग मोबाइल में लूडो.. कुछ यूट्यूब पर 'आज तक लाइव' ! जो पाँच-सात के गुट में है वो राजनीतिक घटनाक्रम पर बात करता मिल जाएगा।
"मिसीर जी, नीतीश कुमार आदमी ठीक है.. बिहार का जितना उन्नति हुआ है सब नीतीश का ही देन है।"
"कर्पूरी बाबू और जगन्नाथ बाबू का कुछो नहीं ?"
तब तक तीसरा टपकेगा।
"मिसरा जी ठीक कह रहे हैं.. बिहार में यादवों का बोलबाला रहा है हमेशा से।"
बिहार की राजनीति पर चर्चा हो रही थी। बिहार की राजनीति का थोड़ा-बहुत इतिहास जानने का मौका मिला कल। पटना में तीन हाईवे बना है.. RTI का डेटा कुछ और कहता है, सरकार कुछ और। एक महाशय का घर गोपालगंज की तरफ था कहीं। नीतीश सरकार से काफी नाखुश हैं.. कहते हैं कि
"साला गांजा पीते-पीते दारू बंद कर दिया है। पहले सिर्फ शनिवार और एतवार को पीते थे अब रोज़ पीते हैं।"
कुछ देर बाद मिश्रा जी एक बात बोले..
"सरकारें कभी भी ठीक नहीं रही हैं, जिस दिन सत्ताधारी और विपक्ष चोरी करना बंद करदे उस दिन लोकतंत्र का जो राजनीतिकरण हुआ पड़ा है वो मर जायेगा। लोकतंत्र अकेला रहा जाएगा, और सरकारों को यह बात पचती नहीं है।" मिश्रा जी का यह कथन मुझमें घर कर गया। मैं रात से इसी पंक्ति को बार-बार दुहराता हूँ। पटना-गया रेलखंड में चलने वाली हरेक पैसेंजर ट्रेन में पाँच-पाँच डिब्बे बढ़ा दिए गए हैं। एक भाजपा समर्थक कह रहा था कि मोदी 'जी' का देन है। वो मसौढ़ी उतर गया बुदबुदाते हुए की अगले बिहार विधानसभा चुनाव में जब भाजपा यहाँ पूर्ण बहुमत से सरकार में आएगी तो 'पटना-गया रेलखंड' में कॉरपोरेट कर्मियों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध कराएगी।
फिर कुछ देर तक बिहार के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की परिस्थिति और उनके आज की परिस्थिति पर चर्चा हुई। एक वरिष्ठ आदमी इस चर्चा में कूदते हुए चिल्लाये-
"टाट के लंगोटा आउ नबाब से यारी ?"
तब तक जहानाबाद आ चुका था, हम उतर गए..

Thursday, November 7, 2019

पटना के बोरिंग रोड चौराहे पर पेगेसस की नज़र

सुबह साढ़े सात बजे का चौराहा है। बोरिंग रोड, पटना ! स्टेशन उतरिये और बुद्धा पार्क के पार्किंग के पास ऑटो लगा रहेगा।
"ए, चौराहा.. चौराहा.. बोरिंग रोड.. एक आदमी.. एक आदमी भीया.. एक आदमी.. कुर्जी, बोरिंग रोड.. कुर्जी, बोरिंग रोड.. क्रिसना अपार्टमेंट.. एक आदमी, एक आदमी, एक आदमी.."
जिस एक आदमी का कमी है उसको पूरा कर दीजिए.. उस सीट को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का कुर्सी नहीं बनाइये। बैठ जाइए। पिछले विधान सभा चुनाव के समय कृष्णा अपार्टमेंट का किराया बारह रुपया था। अब पंद्रह हो गया है.. कुछ दिन में सत्तरह हो जाएगा। टेम्पो वाले समझदार हैं, एक रुपया का नया सिक्का नहीं लेते हैं। देने लगे तो लौटा दिया.. पूछे..
"ई पकिसतान के सिक्का हई का जी ?"
"न भीया, हियाँ कोई लेबे नहीं करता है, त हमहुँ नहीं लेते हैं।"
"ठीक करते हैं, सरकार पेगेसस, इजरायल से देख भी रही है कि के-के लेता है ई सिक्का ! जे ले लेगा उ राष्ट्रविरोधी कहलायेगा। बियाह हो गया है ?"
"हाहा न-न अभी कहाँ ?"
"बियाह होने के बाद ई फंडा छोड़ दीजिएगा की कोई नहीं ले रहा है त हम भी नहीं लेंगे।"
"हाहा.. न-न भीया एकदम सही कहे.. देखाहीसकी में सब चौंधिया गया है खाली।"
हँसने लगा सब, एक लड़की भी बैठी थी.. पटना पोलटेक्निक की, मुँह पर रुमाल रख कर हँसती है। दाँत में पिन लगा हुआ होगा.. हालांकि यह स्त्री होने की शर्त भी है.. फूहड़पन उनलोगों के निर्दिष्ट नहीं है।
सुबह-सुबह का चौराहा शांत है, लेकिन लोगों में हड़बड़ी है.. कॉरपोरेट जगत के लोग अपने-अपने बुल्लेट, पैशन प्रो इत्यादि से चौराहे पर मिल जाएंगे आपको। कोई अपने बच्चे को निर्धारित परिधान पहना कर निकला है.. हैंडल में एक लीटर वाला दूध का स्टील वाला केन है, तोंद बुल्लेट के टंकी पर है और दोनों बच्चों को पीछे बैठाए जा रहे हैं। ये बच्चे कुछ दूर जमाये गए आधुनिकता और अंग्रेज़ी के उद्योग में फेंक दिए जाने हैं जहाँ से वे बड़े होकर सोनाक्षी सिन्हा या संजय निरुपम बन कर निकलेंगे और बारहवीं तक 'स्टड' हो जाएंगे।
चौराहे पर खड़े कुछ लोगों की शादी नहीं हुई है और कुछ वैसे हैं जिनके साथ ये हादसा बीस-पच्चीस साल पहले ही हो चुका है.. वे पैकेट वाला दूध खरीदते हैं। एक लीटर का इकतालीस रुपया.. पाँच रुपया उसको ठंढा करने का। एक लीटर दूध हुआ छयालिस का ! खैर, इसमें मोदी 'जी' की कोई गलती है। वो इन सब चीजों में नहीं रहते हैं। वे आज-कल एकता कपूर के साथ सेल्फी लेने में व्यस्त हैं।
यहाँ कुछ नौजवान भी हैं.. बुल्लेट, R15, पल्सर, अपाचे इत्यादि.. ये अपाचे अमरीका के उन बाइस अपाचे में से नहीं है। लेकिन इस अपाचे और उस अपाचे में एक समानता दिखेगी, दोनों पर "Dad's Gift" लिखा हुआ रहेगा.. एक पर अंजना ओम कश्यप और संबित पात्रा लिखवाएंगे और एक पर 'स्टंटर बॉय आदिल' ने पहले से ही लिखवाया हुआ है.. ये लोग अब यहाँ कुछ देर में सिगरेट और चाय में घुलते पाए जाएंगे। फिर गोल्ड जिम में मार डंबल.. मार डंबल..
लड़कियाँ भी हैं.. सिमेज़, एमिटी, निफ्ट, जेडी वीमेंस और पटना वीमेंस कॉलेज की। गहरा आईलाइनर, छरहरा बदन, लाल-गुलाबी कपड़े, हाथ में मेहंदी और दस-पंद्रह हज़ार का मोबाइल, बस्ते में तीस की एक कॉपी और पाँच का कलम। दोनों मंदिर के पास फूल भी बिक रहा है.. दस का एक गुलाब। सस्ते इश्क़ की शुरुआत। पहले शिव मंदिर बड़ा था.. सड़क के चौड़ीकरण में सिकुड़ कर रह गया है। एक-दो रिक्से, तीन-चार बसें.. आठ-दस ऑटो, और.. और.. और.. और बहुत कुछ।
इन तमाम बातों को पाँच नम्बर वाले सवाल के जवाब में ऐसे लिखा जाएगा -
"बोरिंग रोड चौराहा दिल है। चाय का भाप, सिगरेट का धुआँ, कत्थे का गंध, गुलाब की खुश्बू, और बुल्लेट की ढक-ढक वाली आवाज़ इसकी आत्मा है। कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों के अनुसार 2050-2100 में जब धरती समुद्रमग्न हो जाएगी तब सिर्फ एक दिल और एक ही आत्मा अपने देह में बनी रहेगी। पटना वही देह है, और बोरिंग रोड चौराहा उसका दिल है।"

- मोहित / 08.11.19

Monday, November 4, 2019

प्रेम का त्रिभुज असंवैधानिक है !

त्रिभुज। प्रेम का। प्रेमाश्रित त्रिभुज को असंवैधानिक मान लिया जाना चाहिए। मेरे पास जो अनुभव है, उससे मैं यह तो कह ही सकता हूँ कि प्रेम में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विलम्ब तो और नहीं.. मैंने दोनों की। जल्दबाजी भी, और विलम्ब भी। बाद में पता चला, सौंदर्य जून की सुबह का आसमान है.. इसमें चाँद भी है, बुध भी है, मंगल भी है, सूरज इत्यादि भी हैं। चाँद भी एक तरह का तारा है, मालूम है ? जैसे उसके होठों को गुलाब भी कहते हैं, वैसे हीं.. लेकिन गुलाब का खिलना जरूरी है। गुलाब पौधों में नहीं खिलते, उद्योगों में बनाये जाते हैं.. कॉलेज भी गुलाब का एक उद्योग है। उसके जैसी गुलाबी लड़कियाँ जब मुझ सरीखे रेगिस्तान से इश्क़ कर लें तो गुलाब बनता है..
लेकिन अफ़सोस, उसे गुलाब बनाने में रुचि नहीं थी। मैंने उसकी आँखों में मेरे लिए गुलाबीपन नहीं देखा। मैंने देखा उसे फ़र्क नहीं पड़ता है, इश्क़ में जब फ़र्क पड़ना बंद हो जाये तो इश्क़ सियासी हो जाता है।
मुझे उसके फर्क के पड़ने का इंतज़ार करना चाहिए था, या शायद उसे चिंता करना जल्दी शुरू करना चाहिए था। लिहाज़ा, अब मैं गुलाब नहीं उगा सकता। अब मैं इसका प्रयत्न करूँगा तो मुझे स्वार्थी कहा जायेगा। विश्वासघाती भी। अब या तो वो इंतज़ार कर लो.. या फिर..
लेकिन ! वो बहुत खूबसूरत है, कोई उससे पूछे कि 'कैसी हो', तो उसे कहना चाहिए 'मैं खूबसूरत हूँ, अपना सुनाओ !?'

Friday, November 1, 2019

छठ 2019

मौसी हैं। सहायक प्रोफेसर सह शोध निर्देशक हैं। कहाँ हैं नहीं बताएंगे, नहीं त सब दलाली कराने लगेगा ! बनारस आयी हुईं हैं, ससुराल है उनका। कल से खूब फ़ोटो भेज रही हैं। छठ है। छठ साल में दो बार होता है, चैत्र में और कार्तिक में। हमारे यहाँ चैत्र वाला होता है, चैत्र के खरना के दिन हीं जी नाना का जन्म है इसीलिये। आज हमलोग फ्री हैं। भोरे से ही खखुआ रहे थे कि परसादी खाने जाना है.. चाँप के खाएंगे। आज गुड़ का खीर बनाया जाता है, चक्की में आटा पीस कर उसकी रोटियाँ बनाई जाती हैं। उसका भोग लगता है फिर सारे जानने-पहचानने वाले लोग आकर प्रसाद खाते हैं।
कल रात में 'राजनीति' देख रहे थे, कटरीना कैफ वाला। देर से सोए, देर से उठे। तो नहीं नहाए कि डायरेक्ट सांझ को नहा कर परसादी खाने चल देंगे। साँझ के निकल गए दोस्त-यार साथे की उधर से घूम-घाम कर आएंगे त जाएंगे परसादी खाने.. लीजिये ! गाँजा पीने के बाद सबको लगा भूख, न नहाया न धोया हुए से उठा आ चल दिया भर जहानाबाद में परसादी खींचने। हमहुँ मोटरसाइकिल पर बैठे-बैठे सात-आठ घर देख गए। नाना तब तक फोन कर दिए -
"अरे जल्दी आइये, नहाइये, जाइये.. हमको भी निकलना है प्रसाद खाने.."
"हाँ त चले जाइये न, नानी माँ हैं न घर पर ?"
"नहीं उ चली गयी हैं संजीवबा हीं, उसकी माय भी न छठ कर रही हैं !"
"हाँ त हम भी निकले हुए हैं परसादीये खाने.. आप चाभी लेते जाइये आते समय हम फ़ोन करके पूछ लेंगे की कहाँ हैं !?"
"अरे चांडाल, नहाया है तुम रे ? हरामी कै कटिंग के होता है ? आगे नाथ न पीछे पगहा ! अपने तो करम-धरम करना नहीं है, जे कर रहा है ओकरो चल गया हगली-गाँड़े नास में मिलाबे। टंगड़ी काट देंगे, लौटो नहीं तो।"
"दोस्त लोग साथे थे, देर हो गया। जेतना देर में घरे लौट कर नहाते ओतना में सोंचे खा लेते हैं।"
"साला भर जहानाबाद का जेतना चोर-चोट्टा लइकन है सब तुम्हारे मित्र है। एतना रात तक कहाँ गोल मेज़ कॉन्फेंस कर रहा था ? लौटता है कि नहीं ?"
लीजिये। खाइये क्या खाइएगा.. जेतना के बोक्का न, ओतना के जब्बह कराई ! आधा घंटा से घरही बइठल हैं। अभी नानी बुरा-भला कह रही है, कुछ देर में आएंगे तो श्रीमान कहेंगे। नहीं नहाने पर आज ढेर कार्यक्रम होने वाला है। पूरा मोहल्ला का मनोरंजन होगा। तब तक हम करोड़पति देख लेते हैं, सहवाग आया हुआ है। हा हा हा ..

- मोहित / 01.11.19