Thursday, November 21, 2019

मैं रेल हूँ।

लोग कहते हैं कि मेरी खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें दिख रही है ओस की बूंद, कुहासे, पीली रोशनी के बीच बिछी चारकोल और उस अलकतरे की लम्बी काया पर खड़े-बिखरे झींगुर और ट्रकें। मेरी खिड़की से अब खेत नहीं दिख रहे हैं। इस पहर को यह वरदान है कि तुम्हें तुम्हारे होने पर कोई किसी को नहीं देख सकता। कोई कुछ नहीं देख सकता। एक ऐसा भी पहर है जिसे यह भ्रम है कि उसे लोग चाहते हैं मगर ऐसा नहीं है। इस पहर में घटनाएं ज्यादा होती हैं। जैसे मतदान इसी पहर में होते हैं, यही पहर चोरों की फ़ेहरिस्त में से राजा तलाश लेती है। चुना गया चोर इसी पहर में अपनी चोरी छोड़ने की झूठी शपथ लेता है। इसी पहर में लोग उस शपथ पर तालियाँ बजाते हैं। ख़ैर, मैं अभी रात के तीन बजे किसी खेत के बीच खींची स्याही पर अपने पैर चला रही हूँ। इस पहर में अमूमन स्त्रियों का घर से बाहर निकलना डरावना माना जाता है। मगर, विवशतावश स्त्रियां अपने-अपने कारणों से निकलती ही हैं। लेकिन मैं अपवाद हूँ। मुझे आधी रात को खेतों में खींची इस स्याही पर दौड़ने का निर्देश है। मैं रेल हूँ।

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