जानती हो ?
इन दिनों हर रात एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है जहाँ मैं इस जद्दोजहद में रहता हूँ कि या तो रात का हाथ खींच कर उसे वापिस उस शाम को सौंप दूँ जहाँ हम गंगा किनारे बैठे तुमसे बात कर रहे थे, या फिर जल्द ही वो समय आये जब उस फ्लोर के तमाम फ्लैटधारी सो चुके हों और अब बोतलें खुलें.. तीलियाँ गिनी जाएं.. पत्ते बाँटे जाएं.. चिल्लम का दौर शुरू हो.. और एक कोने में जगजीत जी गुनगुनाएं !
सुनो,
बैठो..
जानती हो ?
तुमसे अलग होने के बाद के इन एक महीने में मैं जब जब अकेला रहा हूँ तब तब खुद को उलझाने का प्रयास किया मैंने.. गाने सुने.. किताबें पढ़ीं.. नज़्में लिखीं.. कविताएं लिखीं.. लेकिन तुमको याद न किया ! पटना में तुम्हारे साथ बिताए गए कुछ डेढ़ साल ज़िन्दगी का शायद स्वर्णिम समय रहा होगा ! लेकिन यही डेढ़ साल सबसे दुखदायी भी रहे.. तुमको याद करने बैठूँ तो पटना में की गयी अय्याशी और मस्ती याद आती है, तुम याद नहीं आती.. आदतन ऐसा नहीं होता था..
कहाँ जा रही हो ?
इधर आओ..
जानती हो ?
तुम अच्छी हो, खूबसूरत हो.. लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं तुमको छोड़ा नहीं जा सकता.. ऐसा घमंड सही नहीं है.. अपने श्रृंगार पर, और शरीर के इस बनावट पर इतना अहंकार सही नहीं है..
चुप हो जाओ,
रो नहीं..
आँख नहीं मलो, जानती हो ?
मुझे बेहद मोहब्बत है तुमसे, तुम्हें भी शायद हो.. लेकिन हिम्मत और मोहब्बत दोनों दो चीजें हैं.. मुझमें इतनी हिम्मत नहीं मैं दोबारा तुमको फ़ोन कर सकूँ, तुमसे मिल सकूँ.. या बात कर सकूँ !
अलविदा प्रिये ! </3
- मोहित / 07.07.19 :))
इन दिनों हर रात एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है जहाँ मैं इस जद्दोजहद में रहता हूँ कि या तो रात का हाथ खींच कर उसे वापिस उस शाम को सौंप दूँ जहाँ हम गंगा किनारे बैठे तुमसे बात कर रहे थे, या फिर जल्द ही वो समय आये जब उस फ्लोर के तमाम फ्लैटधारी सो चुके हों और अब बोतलें खुलें.. तीलियाँ गिनी जाएं.. पत्ते बाँटे जाएं.. चिल्लम का दौर शुरू हो.. और एक कोने में जगजीत जी गुनगुनाएं !
सुनो,
बैठो..
जानती हो ?
तुमसे अलग होने के बाद के इन एक महीने में मैं जब जब अकेला रहा हूँ तब तब खुद को उलझाने का प्रयास किया मैंने.. गाने सुने.. किताबें पढ़ीं.. नज़्में लिखीं.. कविताएं लिखीं.. लेकिन तुमको याद न किया ! पटना में तुम्हारे साथ बिताए गए कुछ डेढ़ साल ज़िन्दगी का शायद स्वर्णिम समय रहा होगा ! लेकिन यही डेढ़ साल सबसे दुखदायी भी रहे.. तुमको याद करने बैठूँ तो पटना में की गयी अय्याशी और मस्ती याद आती है, तुम याद नहीं आती.. आदतन ऐसा नहीं होता था..
कहाँ जा रही हो ?
इधर आओ..
जानती हो ?
तुम अच्छी हो, खूबसूरत हो.. लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं तुमको छोड़ा नहीं जा सकता.. ऐसा घमंड सही नहीं है.. अपने श्रृंगार पर, और शरीर के इस बनावट पर इतना अहंकार सही नहीं है..
चुप हो जाओ,
रो नहीं..
आँख नहीं मलो, जानती हो ?
मुझे बेहद मोहब्बत है तुमसे, तुम्हें भी शायद हो.. लेकिन हिम्मत और मोहब्बत दोनों दो चीजें हैं.. मुझमें इतनी हिम्मत नहीं मैं दोबारा तुमको फ़ोन कर सकूँ, तुमसे मिल सकूँ.. या बात कर सकूँ !
अलविदा प्रिये ! </3
- मोहित / 07.07.19 :))
