इंस्टाग्राम पर चाय साहित्य पढ़ कर मन भिन्ना गया है। क्या हगा है सब मिल कर, आह! अब कभी चाय देखते हैं तो इंस्टाग्रामीया सब याद आ जाता है। घर या गुमटी पर चाय पीने का एकदम मन नहीं करता। सोंचते हैं किसी नामी हिंदी अखबार में संपादक-उम्पादक हो जाएं। कलकत्ता के किसी खानदानी जमींदार के सफेद हवेली के बड़का लॉन में लोहा का गोल सफ़ेद कुर्सी पर पैर पर पैर चढ़ा कर के देश के राजनीतिक घटनाक्रम पर बातचीत हो रही हो और उधर से कंधा पर गमछी रखे कोई नौकर चीनी मिट्टी के कप में चाय लेकर आ जाए..
"अरे अरे सेठ जी, इसकी क्या जरूरत थी ?"
"क्या बात करता है मोहित बाबू, तुम ठहरा देस का इतना बड़ा एडिटर। किसी भी नेता का बखिया उधेड़ देता है। सरकार तक गिरवा देता है। हम कुछ भी भूल जाए, लेकिन तुम्हारा संपादकीय पढ़ना एकदम नहीं भूलता। तुमको नहीं चाय पिलायेगा तो किसको पिलायेगा !?"
"हें हें हें, सेठ जी! बस, आप बड़े लोगों का आशीर्वाद है सब।" उसके बाद कप को प्लेट में रख-रख के आराम से चाय का ज़ायका लेते हुए - 'सुड़क'।
मालूम नहीं इन सबको घर पर कप प्लेट में चाय कैसे मिल जाता है। हमको तो स्टील के गिलास में मिलता है। नानी माँ को कितना बार बोले हैं कि मामा जो पुर्तगाल से कप-प्लेट का सेट लाया था उसमें चाय दिया कीजिये, लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। कहती हैं कि जब हमको अगुआ देखने आएगा तब वो वाला सेट निकलेगा।
मानो मई-जून के दौरान, हमारे मकान के बाहर वाले कमरे में उत्तराखंड से एक ब्राम्हण का परिवार, लड़का देखने आया हुआ हो। बढ़िया उजला पुर्तगाली कप-प्लेट में चाय परोसा गया हो। अदरक-वदरक डाल के। भुजिया, मिक्चर इत्यादि.. इसी बीच जी नाना, भाई को आदेश दिए..
"मोहित कहाँ हैं ? बुलाइये.."
"बड़े भ्राता तो आज प्रातः काल ही जावा पर सवार होकर अपने मित्रों के साथ काको ब्लॉक पर लिट्टी खाने गए हुए हैं! शाम तक आवेंगे.."
"हद्द हरामी लइका है, उनको संदेश भेज दीजिये। ई लगन में बियाह करना है तो कर लें अन्यथा जीवन भर बंड रह जाएंगे।"
व्हाट्सएप पर जैसे ही छोटका भाई का संदेश प्राप्त हुआ, लिट्टी-ऊट्टी हुएं छोड़-छाड़ के जावा रेलते हुए घर। परनाम-पाती हुआ। क्या करते हैं, कितना पढ़े हैं, कितना कमाते हैं, रहते कहाँ हैं, चार हज़ार का क्या किये जैसा प्रश्न। फिर कभी यदा-कदा ससुरारी गए, तो..
"आइये पाहुन, बैठिए पाहुन, आने में कोई दिक्कत ? घर-परिवार, नौकरी-चाकरी सब ?"
एहि सब सवाल के बीच उधर से छोटकी साली फूल वाला ट्रे में रख के एक कप चाय..
"ज़ीज़ू, सिनेमा दिखाने नहीं ले चलिएगा ?"
"चलो! जिज्जा हैं कि खेला हैं ? चहबा पी लेने दो पहिले.." हाहाहा..
"अरे अरे सेठ जी, इसकी क्या जरूरत थी ?"
"क्या बात करता है मोहित बाबू, तुम ठहरा देस का इतना बड़ा एडिटर। किसी भी नेता का बखिया उधेड़ देता है। सरकार तक गिरवा देता है। हम कुछ भी भूल जाए, लेकिन तुम्हारा संपादकीय पढ़ना एकदम नहीं भूलता। तुमको नहीं चाय पिलायेगा तो किसको पिलायेगा !?"
"हें हें हें, सेठ जी! बस, आप बड़े लोगों का आशीर्वाद है सब।" उसके बाद कप को प्लेट में रख-रख के आराम से चाय का ज़ायका लेते हुए - 'सुड़क'।
मालूम नहीं इन सबको घर पर कप प्लेट में चाय कैसे मिल जाता है। हमको तो स्टील के गिलास में मिलता है। नानी माँ को कितना बार बोले हैं कि मामा जो पुर्तगाल से कप-प्लेट का सेट लाया था उसमें चाय दिया कीजिये, लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। कहती हैं कि जब हमको अगुआ देखने आएगा तब वो वाला सेट निकलेगा।
मानो मई-जून के दौरान, हमारे मकान के बाहर वाले कमरे में उत्तराखंड से एक ब्राम्हण का परिवार, लड़का देखने आया हुआ हो। बढ़िया उजला पुर्तगाली कप-प्लेट में चाय परोसा गया हो। अदरक-वदरक डाल के। भुजिया, मिक्चर इत्यादि.. इसी बीच जी नाना, भाई को आदेश दिए..
"मोहित कहाँ हैं ? बुलाइये.."
"बड़े भ्राता तो आज प्रातः काल ही जावा पर सवार होकर अपने मित्रों के साथ काको ब्लॉक पर लिट्टी खाने गए हुए हैं! शाम तक आवेंगे.."
"हद्द हरामी लइका है, उनको संदेश भेज दीजिये। ई लगन में बियाह करना है तो कर लें अन्यथा जीवन भर बंड रह जाएंगे।"
व्हाट्सएप पर जैसे ही छोटका भाई का संदेश प्राप्त हुआ, लिट्टी-ऊट्टी हुएं छोड़-छाड़ के जावा रेलते हुए घर। परनाम-पाती हुआ। क्या करते हैं, कितना पढ़े हैं, कितना कमाते हैं, रहते कहाँ हैं, चार हज़ार का क्या किये जैसा प्रश्न। फिर कभी यदा-कदा ससुरारी गए, तो..
"आइये पाहुन, बैठिए पाहुन, आने में कोई दिक्कत ? घर-परिवार, नौकरी-चाकरी सब ?"
एहि सब सवाल के बीच उधर से छोटकी साली फूल वाला ट्रे में रख के एक कप चाय..
"ज़ीज़ू, सिनेमा दिखाने नहीं ले चलिएगा ?"
"चलो! जिज्जा हैं कि खेला हैं ? चहबा पी लेने दो पहिले.." हाहाहा..
(इस विषय पर विस्तार से फिर कभी..)
