Saturday, February 22, 2020

चाय ही चरस है।


इंस्टाग्राम पर चाय साहित्य पढ़ कर मन भिन्ना गया है। क्या हगा है सब मिल कर, आह! अब कभी चाय देखते हैं तो इंस्टाग्रामीया सब याद आ जाता है। घर या गुमटी पर चाय पीने का एकदम मन नहीं करता। सोंचते हैं किसी नामी हिंदी अखबार में संपादक-उम्पादक हो जाएं। कलकत्ता के किसी खानदानी जमींदार के सफेद हवेली के बड़का लॉन में लोहा का गोल सफ़ेद कुर्सी पर पैर पर पैर चढ़ा कर के देश के राजनीतिक घटनाक्रम पर बातचीत हो रही हो और उधर से कंधा पर गमछी रखे कोई नौकर चीनी मिट्टी के कप में चाय लेकर आ जाए..
"अरे अरे सेठ जी, इसकी क्या जरूरत थी ?"
"क्या बात करता है मोहित बाबू, तुम ठहरा देस का इतना बड़ा एडिटर। किसी भी नेता का बखिया उधेड़ देता है। सरकार तक गिरवा देता है। हम कुछ भी भूल जाए, लेकिन तुम्हारा संपादकीय पढ़ना एकदम नहीं भूलता। तुमको नहीं चाय पिलायेगा तो किसको पिलायेगा !?"
"हें हें हें, सेठ जी! बस, आप बड़े लोगों का आशीर्वाद है सब।" उसके बाद कप को प्लेट में रख-रख के आराम से चाय का ज़ायका लेते हुए - 'सुड़क'।
मालूम नहीं इन सबको घर पर कप प्लेट में चाय कैसे मिल जाता है। हमको तो स्टील के गिलास में मिलता है। नानी माँ को कितना बार बोले हैं कि मामा जो पुर्तगाल से कप-प्लेट का सेट लाया था उसमें चाय दिया कीजिये, लेकिन कोई सुनवाई नहीं है। कहती हैं कि जब हमको अगुआ देखने आएगा तब वो वाला सेट निकलेगा।
मानो मई-जून के दौरान, हमारे मकान के बाहर वाले कमरे में उत्तराखंड से एक ब्राम्हण का परिवार, लड़का देखने आया हुआ हो। बढ़िया उजला पुर्तगाली कप-प्लेट में चाय परोसा गया हो। अदरक-वदरक डाल के। भुजिया, मिक्चर इत्यादि.. इसी बीच जी नाना, भाई को आदेश दिए..
"मोहित कहाँ हैं ? बुलाइये.."
"बड़े भ्राता तो आज प्रातः काल ही जावा पर सवार होकर अपने मित्रों के साथ काको ब्लॉक पर लिट्टी खाने गए हुए हैं! शाम तक आवेंगे.."
"हद्द हरामी लइका है, उनको संदेश भेज दीजिये। ई लगन में बियाह करना है तो कर लें अन्यथा जीवन भर बंड रह जाएंगे।"
व्हाट्सएप पर जैसे ही छोटका भाई का संदेश प्राप्त हुआ, लिट्टी-ऊट्टी हुएं छोड़-छाड़ के जावा रेलते हुए घर। परनाम-पाती हुआ। क्या करते हैं, कितना पढ़े हैं, कितना कमाते हैं, रहते कहाँ हैं, चार हज़ार का क्या किये जैसा प्रश्न। फिर कभी यदा-कदा ससुरारी गए, तो..
"आइये पाहुन, बैठिए पाहुन, आने में कोई दिक्कत ? घर-परिवार, नौकरी-चाकरी सब ?"
एहि सब सवाल के बीच उधर से छोटकी साली फूल वाला ट्रे में रख के एक कप चाय..
"ज़ीज़ू, सिनेमा दिखाने नहीं ले चलिएगा ?"
"चलो! जिज्जा हैं कि खेला हैं ? चहबा पी लेने दो पहिले.." हाहाहा..
(इस विषय पर विस्तार से फिर कभी..)

Monday, February 10, 2020

फरवरी के धूप में इश्क़ नहीं हो पायेगा।


अभी रवीश कुमार के वॉल पर फरवरी की धूप के बारे में पढ़ रहे थे। 'फरवरी बिना बात किये गुज़ार देते हैं..' बढ़िया लगा पढ़ कर। लगा की उनके पास फरवरी की धूप देखने का कितना अलग नज़रिया है। दिल्ली, फरवरी, दोपहर, गर्लफ्रेंड, थेथरई सब है। लेकिन कमेंट सेक्शन में उदासी है। हर सुधीर का अर्णब आता है, कुणाल कुणाल की बात है.. हाहा..
मेरी फरवरी की दोपहर अलग होती है। इश्क़ हुआ, स्कूल के दिनों में तो सिर्फ यही होता रहा। जहानाबाद-पटना का समय इश्क़ करते-करते ही समाप्त हो गया.. लेकिन कभी फरवरी में रुमानवाद नहीं दिखा। हर तरफ सिर्फ उदासी.. रवीश जी के कमेंट सेक्शन के जैसी। फरवरी की धूप ज्यादा कुछ नहीं, मार्च की चिलचिलाती दोपहर से पहले की शाम मात्र-सी है। वेलेंटाइन फरवरी में नहीं होनी चाहिए। प्यार का मौसम है दशहरा से दीवाली के बीच का समय। एक हाथ से दुपट्टा संभालते आउ एक में पित्तल के लोटा में भर लोटा जल ले जा रही किसी कन्या के आगे-पीछे घूमिये - मंदिर में चिठ्ठी दीजिये - मेला में साथे चाट/फोकचा खाइए - बड़का नाव पर झुलिये, इत्यादि.. दीवाली की शाम को लंबका चाइनीज़ लड़ी भर पंजा में पकड़ कर गर्लफ़्रेंड साथे सेल्फी लीजिये। पटना के 'बाँसुरिवाला' या जहानाबाद के 'माँ तारा' रेस्टोरेंट में। उसी बीच कान/गर्दन चुम लीजिये, वहीं रेस्टोरेंट के 'कपल सेक्शन' में अपना रूमान शुरू।
"एहि लिए लाया हो तुम हमको हियाँ ?"
"ए प्रीति आज नहीं बोलो कुछ, अइसे छूछे खाली हाथ पकड़ के घूमे में का मज़ा है ?" हाहाहा.. अब न हुआ वेलेंटाइन ! फरवरी के धूप में कुछ नहीं होगा। भोरे-भोरे चार चप्पल से पिटाने पर तो कंबल छूटता है। ऐसे कहीं प्रेम निकलेगा ? फरवरी के धूप का आनंद इसमें है की भरल दुपहरिया में नहा धो कर - छत पर बड़का चटाई - उसपर गेंदरा - माय, मौसी, भाई, बहिन साथे स्टील के बड़का थाली में एक तरफ चावल एक तरफ कटहल का रसदार सब्जी, पापड़, तिलौरी इत्यादि के साथ कनैली के पौधा के पीछे धूप सेंकते हुए गबागब बड़का-बड़का कौर। तब तक में अल्टीमेटम आ जायेगा..
"अब चुप चाप पढ़े बइठ न त टंगरिया तोड़ देबउ!" हुएं कान में करुआ तेल डाल कर 'आरएस अग्रवाल' के किताब से एग्जाम्पल छापते रहिए। फिर वही फरवरी के धूप में आगे-पीछे का माहौल देखते हुए आँख पर गमछी रख के मार फोंफ, मार फोंफ.. मिज़ाज़ हरा हो जाएगा। इसके बाद शाम में जब मौसी पूछ देगी की 'टैन थीटा बाई कॉस थीटा क्या होता है" त मुँह फार दीजिये। अइसही मैट्रिक फेल नहीं होता है लइकन, मई-जून में होने वाले गृह प्रवेश का भूमि पूजन एहि फरवरी के दुपहरिया में होता है.. हाहाहा..

Monday, February 3, 2020

तुम्हारे जैसी लड़कियाँ पेट में नहीं पलती होंगी।


"कैसे हो तुम मोही ?"
- सवाल ही गलत है तुम्हारा। मैं हूँ ही कहाँ ? मुझे हमारे बीच में बहुत अरसे से 'मैं' नहीं दिखा। तुम हो, सिर्फ तुम। जो तुम सोंच लो वही होना है। जो तुम कह दो, वही कानून है। तुम्हें 'अभी व्यस्त हैं' का अर्थ समझ नहीं आता। तुम्हें 'ना' सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम्हें लगता है कि तुम इश्क़ कर रही हो। मैं तो ख़ैर बस वक़्त ज़ाया कर रहा हूँ। इतने के बावजूद तुम नाराज़ होकर फ़ोन काट देती हो। सुनो, तुम अकारण ही उदास रहती हो। कितना कुछ तो है तुम्हारे पास खुश होने के लिए। तुम्हें मेरी क्या ही जरूरत है ? तुम्हें किसी की भी क्या जरूरत है ? तुम जैसी लड़कियों का नाम तो किसी वैसे पेड़ के नाम पर रखा जाना चाहिए जिनपर पतझड़ का प्रभाव न पड़ता हो। तुम्हारे जैसी लड़कियाँ पीपल की कोमल पत्तियों के बीच उगती होंगी। ऐसी कौन-से किस्म की माँ होती होंगी जो तुम जैसी लड़कियों को जन्म देती सकें ? मुझे तो नहीं लगता की तुम जन्मी भी हो। किन्हीं कारणों से ईश्वर को अवतार वाली प्रथा बंद करनी पड़ी इसलिए वे तुम जैसी लड़कियों को दरख़्तों पर उगाने लगे। आज का वनस्पति विज्ञान यह कभी नहीं जान पायेगा की इस सदी के पहले वर्ष के अगहन में पटना की किसी गाँव के बड़े से पीपल की कोमल पत्तियों के बीच एक सुंदर-सी 'नवउत्पन्न' लड़की को झूलता पाया गया। जिसका रंग हरा नहीं था। जिस कुल ने उस पेड़ को सालों पहले बोया था, वह लड़की उसी कुल में दे दी गयी। तब से गाँव के सारे लोग पीपल बोते रहते हैं। उन्हें लगता है कि किसी दिन तुम-सी एक लड़की उनके यहाँ भी आएगी।

"मैं ठीक हूँ। जानती हो ? मुझे बचपन से ही पीपल के पेड़ों के आस-पास जाने से रोका जाता रहा है।"
"आँ ? क्या ? क्या बोल रहे हो ?"
"कुछ नहीं। मैं अभी व्यस्त हूँ, फ़ोन रखता हूँ।"

बिहार के दिसंबर में बहार है।


इस साल के दिसंबर की चौबीसवीं सुबह में, आलस्य की ऊनि चादर और कोहरे की धुंध के बीच सोया सूर्य भी आलसी हो चुका है।
जाड़े की सुबह हमेशा पसंदीदा रही है। लड़कपन में स्कूल जाने के लिए जूनियर वर्ग के लड़के जाड़े में फुल पैंट पहनते थे। दूसरे-तीसरे क्लास में दिसंबर के पहले हफ्ते का पहला दिन.. उजला-उजला पैंट मौसी माँ आयरन करके देती थीं। उजला जूता भी - बुधवार और शनिवार। जुम्मन चा का रिक्शा दुआर पर..
"मोहित बाबू, रिक्सा आ गया.."
दिसंबर में घर से सुबह-सुबह उजला-उजला कपड़ा पहन कर निकलने में एकदम लग्जरी लगता था। ये अंत तक रहा.. मतलब आठवां में बेल बॉटम पैंट के रिटायर होने पर एक शानदार पैंट सिलवाये थे - कमर से भी नीचे कर के पहनते थे। वो हनी सिंह का समय था और 'बैलून पैंट' फैशन में था। नौवां में थे.. फ्लोर पर मार्बल लगा हुआ था। शनिवार या बुधवार रहा होगा। मामा का स्पोर्ट्स शु पहन कर स्कूल गए.. मार्बल पर दौड़ कर ससरे तो सीधे 'B' सेक्शन के आगे रुके.. शैम्पू किया हुआ बाल था.. भोर का समय। बाल हवा में लहराया तो शाम में उसी सेक्शन की एक लड़की हमको फेसबुक पर कह दी कि
"जब आज तुम ससर कर गेट पर आये थे तो बड़े हैंडसम लग रहे थे"
बस। दसवाँ तक वही पैंट, वही शर्ट वैसा ही हेयर स्टाइल। वो बात अलग है कि वो लड़की बाद में मेरे बेंचमेट की गर्लफ्रेंड हो गयी थी।
समय बदला, जवान होने लगे.. जहानाबाद पीछे रह गया और हम पटना रहने लगे। दिसम्बर भी आया, सुबह भी आई। मामा 2009 के दिसंबर में पुर्तगाल जाने के लिए दिल्ली से एक जैकेट लिया था। जो 2017 के दिसंबर में उसकी बारात में खो गया। हमको वो जैकेट बड़ा पसंद था। हम माँग लिए थे। उस जैकेट का तारीफ सब कोई करता रहा। पटना के बोरिंग रोड में दिसंबर की सुबह-सुबह छे बजे फिजिक्स के क्लास जाने की एकमात्र वजह.. शानदार काला जैकेट - नीचे डेनिम - जूता - बाल हवा में लहरा रहा है - चेहरा पर कटिहार वाले राहुल से मांग के निविया का मॉस्चोराईज़र भी - फिर रोड पर हाथ को चिल्लम पीने के स्टाइल में करके उसमें मुँह से गर्म भाँप मारते हुए लड़की देखना। अहाहा.. परम आनंद।
पटना का बोरिंग रोड बिहार का फैशन हब है। आड़े-तिरछे बाल, बिना मोजा का जूता, लड़की हाफ पैंट में, लइकन फूल पैंट में। वन पीस, डंगरी इत्यादि में ये सुंदर-सुंदर लड़की की क्या बताएं ? दिनकर जी अगर आज के दिन में पटना विश्वविद्यालय के छात्र होते तो उर्वशी कोई आकाश की अप्सरा नहीं, बोरिंग रोड के गर्ल्स हॉस्टल की कोई लड़की होती। जो दिसंबर की शाम कृष्णापूरी पार्क के बाहर मोमोज़ खाती.. और हम रहते पुरुरवा, मोमोज़ का पईसा देते। हाहाहा..

पटना कब लौटोगे ?


पटना से पार्टनर आउ अशुतोष का फ़ोन आया था। जहानाबाद लौटने की बबात पूछ रहा था। जब फ़ोन करता है पटना आने के लिए कहता है। बुलावे में 'आग्रह' की मात्रा इतनी अधिक कि अगर आपका बस चले तो आप अपने मंडप से उठ कर पटना भाग जाएं। कभी-कभी हमको खुद लगने लगता है कि दुनिया को इस सलीके से बनाना चाहिए था कि दुनिया का हर शहर पटना के पचास किलोमीटर के दायरे में हो.. जूता के फीता बाँधते हुए जावा के चाभी उठाये आउ भाग गए पटना। पीछे से नाना "एतना भोरे-भोरे, कहाँ जी ?" करते रहें.. अब जब तक पटना के बेली रोड के पीला बत्ती में अस्सी-सौ के स्पीड पर जावा नहीं रगेदायेगा तब तक स्साला देह चुनचुनाते रहेगा। एक हाथ से एक्सलेटर ऐंठते आउ एक हाथ शानदार वैन ह्यूसेन के जैकेट में.. भर मुँह मगहिया पान भी। बिना हेलमेट के.. रंगदार टाइप, एक-दो बजे रात में !
जाड़ा सबसे पसंदीदा मौसम रहा है, दिसंबर या जनवरी की रात, पुनाईचक स्थित अपने किराए के मकान में फ़र वाला कम्बल में घुस कर ताश खेलना।
पटना रहते थे त नानी माँ को कह दिए थे कि जी नाना अगर घर से पटना जाने के लिए निकलें तो हमको एकदम बता दिया कीजिये। भोरे-भोरे फ़ोन आ गया त ओहि माघ के भोर में फेनाइल डाल कर रूम पोछा रहा है.. लइकन के सात बजे उठा-उठा कर अपने-अपने होस्टल भगाया जा रहा है.. मार रूम फ्रेशनर के पूरा रूम महका दिया गया है। रूम इतना सुंदर और स्वच्छ लग रहा है कि जैसे नयकी भौजी आ रही हैं, बिछावन पर गुलाब का पंखुड़ी रख दीजिए तो बिहअउती से कम नहीं लगेगा। कहीं से कोई सुराख नहीं छोड़ा गया है, माचिस का तीली भी फेंका गया है तो दूसरा गली के नली में। हाथ ठिठुर गया है, किताब-कॉपी खोल कर बैठे रहिए.. कभी भी महामहिम उधर से चूड़ा, गुड़ आउ तिलकुट लेकर आ रहे होंगे। एतना के भी में नाना आएंगे त कहीं न कहीं से देख कर कह ही देंगे कि
"खिड़की पर तो झोल लगा हुआ है, साफ-सफाई रखना चाहिए। नहाए केतना दिन हुआ है ?"
"कल ही नहाए थे, अब सकरात में नहा लेंगे। आप लोड नहीं लीजिये।"
"बोक्का नीयर गमक रहा दूरे से.. नहाओ तो पहिले तुम आज !"
"ए जी नाना माथा नहीं भुकाइये। अलगे क्रांति लेकर आते हैं आप!"
"लाज-सरम सब बेंच कर सोमपापड़ी खा गए हो जी ? जे विद्यार्थी नहायेगा नहीं से पढ़ेगा का ? हमनी लइकन नहीं थे ? भोरे-भोरे नहा कर ठाकुर जी के घंटी बजा आते थे, दीन-धरम सब भुला गया है।"
पानी एकअछिया चूल्हा पर चढ़ा दिया गया है। कोतवाली थाना में लिख कर दे दीजिए कि आपका शोषण हो रहा है, लेकिन फिर मोना सिनेमा हॉल में सत्तर एमएम के पर्दा कर कटरीना कैफ को नाचते देखने के लिए पैसा कौन देगा ? सोंच लीजिये.. :|

Monday, November 25, 2019

मेला 2019

मेला है। निशानेबाजी का दुकान लगा है। दस का चार गोली छोड़ सकते हैं। सिर्फ चार। महंगाई सिर्फ ऑटो सेक्टर में नहीं है ! आसमान में खो जाने वाला बैलून बीस रुपये का बिक रहा है। आपको दस में सिर्फ पाँच गोलगप्पे मिल पाएंगे। मैं झूले नहीं झूलता तो उसकी कीमत मालूम नहीं है। लेकिन इतना जरूर जानता हूँ कि यदि इतने महंगे मेले जेएनयू में लगाये जाएं तो विरोध नहीं ही होगा !
ख़ैर, मेला में सबसे सही चीज़ होती है पीले रंग की गोली वाली माउज़र ! यहाँ नहीं मिल रही है.. रंग-बिरंगे खाने के स्टॉल नहीं होते तो मेले का मज़ा बर्बाद होने ही वाला था..
"म्मा मुझे घर जाना है !" बहन बोली.. रोने लगी।
इन लोगों को मेला पसंद नहीं है। कुछ है ही नहीं करने लायक.. घर लौट कर मोबाइल में 'लकड़ी की काठी' सुन रही है। अब ठीक है। चुप हो गयी है.. सब नार्मल है। घर के बाहर बहुत शोर था। बाहर का वातावरण पॉल्यूटेड है। धूल उड़ती है.. मेरी बहन सरीखी लड़कियाँ बड़ी होकर जब इंस्टाफेम बनती हैं तो गाँव, पतली सड़कों और मेले का फोटो 'हैशटैग नोस्टाल्जिया, करके अपलोड करती हैं।
मैं भी सोंच रहा हूँ कि अब बाहर न ही जाया जाए.. बाहर है ही क्या ? कुछ भी तो नहीं.. विधायक लोग भी तो आज सुबह-सुबह होटल बुला लिए गए हैं ! मेले का रोमांच खत्म होता जा रहा है.. मेले के आयोजकों ने अब 'सेल्फी पॉइंट' ईजाद किये हैं। मेले के मुख्य द्वार या उससे पहले ही पॉइंट लगाया जाता है। आधे-आधे घंटे पर कपड़े और कनबाले बदल-बदल कर जाएं और तस्वीरें ले कर लौट आएं। मेले में जाने से जुल्फ़ें बिखर जाएंगी.. मैल बैठ जाएगा। कपड़े गंदे हो जाएंगे.. मेले में जाने से आप मानसिक अवसाद में चले जायेंगे.. मेलों में न जाएं। मेले त्याज्य रहें तो बेहतर होगा। जितना वक़्त आप मेलों में बर्बाद करेंगे उतने में आप या तो मेला फ़िल्म देख कर मेले को समझ लें.. या फिर एक-आध 'थर्टीन रिजन्स व्हाय' के एपिसोड देख लें। आपकी शाम क़ायदे से सफल मानी जायेगी।

- मोहित / 24.11.19

Thursday, November 21, 2019

मैं रेल हूँ।

लोग कहते हैं कि मेरी खिड़की से बाहर देखते हुए उन्हें दिख रही है ओस की बूंद, कुहासे, पीली रोशनी के बीच बिछी चारकोल और उस अलकतरे की लम्बी काया पर खड़े-बिखरे झींगुर और ट्रकें। मेरी खिड़की से अब खेत नहीं दिख रहे हैं। इस पहर को यह वरदान है कि तुम्हें तुम्हारे होने पर कोई किसी को नहीं देख सकता। कोई कुछ नहीं देख सकता। एक ऐसा भी पहर है जिसे यह भ्रम है कि उसे लोग चाहते हैं मगर ऐसा नहीं है। इस पहर में घटनाएं ज्यादा होती हैं। जैसे मतदान इसी पहर में होते हैं, यही पहर चोरों की फ़ेहरिस्त में से राजा तलाश लेती है। चुना गया चोर इसी पहर में अपनी चोरी छोड़ने की झूठी शपथ लेता है। इसी पहर में लोग उस शपथ पर तालियाँ बजाते हैं। ख़ैर, मैं अभी रात के तीन बजे किसी खेत के बीच खींची स्याही पर अपने पैर चला रही हूँ। इस पहर में अमूमन स्त्रियों का घर से बाहर निकलना डरावना माना जाता है। मगर, विवशतावश स्त्रियां अपने-अपने कारणों से निकलती ही हैं। लेकिन मैं अपवाद हूँ। मुझे आधी रात को खेतों में खींची इस स्याही पर दौड़ने का निर्देश है। मैं रेल हूँ।