त्रिभुज। प्रेम का। प्रेमाश्रित त्रिभुज को असंवैधानिक मान लिया जाना चाहिए। मेरे पास जो अनुभव है, उससे मैं यह तो कह ही सकता हूँ कि प्रेम में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। विलम्ब तो और नहीं.. मैंने दोनों की। जल्दबाजी भी, और विलम्ब भी। बाद में पता चला, सौंदर्य जून की सुबह का आसमान है.. इसमें चाँद भी है, बुध भी है, मंगल भी है, सूरज इत्यादि भी हैं। चाँद भी एक तरह का तारा है, मालूम है ? जैसे उसके होठों को गुलाब भी कहते हैं, वैसे हीं.. लेकिन गुलाब का खिलना जरूरी है। गुलाब पौधों में नहीं खिलते, उद्योगों में बनाये जाते हैं.. कॉलेज भी गुलाब का एक उद्योग है। उसके जैसी गुलाबी लड़कियाँ जब मुझ सरीखे रेगिस्तान से इश्क़ कर लें तो गुलाब बनता है..
लेकिन अफ़सोस, उसे गुलाब बनाने में रुचि नहीं थी। मैंने उसकी आँखों में मेरे लिए गुलाबीपन नहीं देखा। मैंने देखा उसे फ़र्क नहीं पड़ता है, इश्क़ में जब फ़र्क पड़ना बंद हो जाये तो इश्क़ सियासी हो जाता है।
मुझे उसके फर्क के पड़ने का इंतज़ार करना चाहिए था, या शायद उसे चिंता करना जल्दी शुरू करना चाहिए था। लिहाज़ा, अब मैं गुलाब नहीं उगा सकता। अब मैं इसका प्रयत्न करूँगा तो मुझे स्वार्थी कहा जायेगा। विश्वासघाती भी। अब या तो वो इंतज़ार कर लो.. या फिर..
लेकिन ! वो बहुत खूबसूरत है, कोई उससे पूछे कि 'कैसी हो', तो उसे कहना चाहिए 'मैं खूबसूरत हूँ, अपना सुनाओ !?'
Monday, November 4, 2019
प्रेम का त्रिभुज असंवैधानिक है !
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