Sunday, September 15, 2019

हिंदी दिवस

भाषा या साहित्य का दिवस नहीं होता, उसकी सदी होती है.. काल होता है। हिंदी साहित्य को चार काल मिले..
वीरगाथा काल- भक्ति काल- रीतिकाल- आधुनिक काल।
आधुनिकता की चाटुकारिता की यह मिसाल है कि आज मेरे टाइमलाइन पर हिंदी दिवस के बारे में सिर्फ वही लिख रहे है जो हिंदी 'लिखते' हैं..
मैं हिंदी का भारत में दो रूप देखता हूँ- हिंदी बोली (तेरेको-मेरेको), और हिंदी लेखन (मैं-आप) !
कई हैं जो सिर्फ हिंदी बोलते हैं लेकिन लिखते नहीं..
जैसे उन्होंने सारे काम हिंदी में किये हैं, मेरे क्लास के कुछ लड़के गालियाँ हिंदी में देते थे लेकिन दंडस्वरूप उन्हें अगर स्कूल से सस्पेंड किया जाता तो वे इसकी माफी के लिए प्रधानाचार्य को जो पत्र लिखते, उसे
To,
The principal
से शुरू करते, वहीं अगर..
सेवा में,
प्राचार्य महोदय
लिखा होता तो आज हिंदी का ये हस्र नहीं होता !
कई हैं जो लिखते और बोलते दोनों हैं.. ये वही हैं जिन्हें इस भाषा की चिंता है, इसकी विवेचना के लिए समय है, इसके अस्तित्व को बनाये रखने की दृढ़ता है, जिनमें हिंदी का रक्त है, जो हिंदी को मात्र मैट्रिक इंटर की कहानियों तक ही सीमित नहीं रखे.. वहाँ से आगे लेकर चले.. हिंदी 'गंगास्तुति' से शुरू होकर.. 'उर्वशी' को प्रणाम करते सारे समाज को 'जुलूस' बनाते और अपने से उम्र में छोटी भाषाओं को 'गोदान' दे देते हुए जब यहाँ 'चौरासी' या 'अक्टूबर जंक्शन' पर भी पहुँचती है तब भी उसमें इतनी जान बच जाती है कि और असंख्य पीढ़ियों को अपने प्रकाश से उद्वेलित कर सके।
हिंदी का कोई छोर नहीं है.. यानी हिंदी यहाँ से शुरू हुई और बस यहीं तक गयी.. हिंदी को जितना बनना था बिगड़ना था वो बन बिगड़ चुकी है..
संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - हिंदी
मैं वो नहीं हूँ जो लिखूँ की "मैं अंग्रेजी का विद्रोह नहीं करता" मैं करता हूँ.. अंग्रेज़ी को इस राष्ट्र से हट जाना चाहिए.. और जर्मन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली भाषाओं की तरह 'फॉरेन लैंग्वेज' की श्रेणी में डाल देना चाहिए.. इसे उच्च विद्यालय तक तो पढ़ाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है.. भाषा के इस बदलाव से भारत में 'शिक्षित' और 'अशिक्षित' शब्द की नई व्याख्या/परिभाषा सामने आएगी ! सरकार को पहले भाषा और संस्कृति के छेत्र में काम करने की जरूरत है, मध्यस्थता और पारस्परिकता के संदर्भ में हिंदी सारगर्भित करना श्रेष्ठकर होगा !

- जय हिंदी, जय हिंदुस्तान 🙏

Wednesday, September 4, 2019

जावा बयालीस

कल गए पटना, पिछला साल के नवंबर से ही जाल बाँध रहे थे - हमारा घर वैसा नहीं है कि - "मोटरसाइकिल ले दीजिए नहीं त नदी में कूद जाएंगे !"

ऐसा कहेंगे त नाना खुद उठा कर भोरे भोरे सुतला में नदी में परवह कर देंगे !

"न पढ़े के न लिखे के, जे लइका एक लाख के मोटरसाइकिल चढ़ेगा उ का पढ़ेगा ? हमनी लइकन नहीं थे ? तीन कोस पैदल जाते थे पढ़े ! तीन कोस समझता है रे तुम ?"
"किलोमीटर में बताइए, हमको कोस आ भोंस नहीं बुझाता है !"
"ई देखिए नबाबी ! वाह बेटा, बढ़िया पढ़ाई पढ़ा तब तो.. तीन कोस में छौ मील माने नौ किलोमीटर !"
"बस त वही नौ किलोमीटर हम जावा से जाएंगे ! अट्ठारह सावन भादो देख लिए अब कहिया चढ़ेंगे गाड़ी पर ? दोसरे के गाड़ी में पेट्रोल भरवाते दिन जाएगा ?"
"गाँड़ में गुह न माई रे हग्गम ! एक पईसा का रोजी नहीं है आउ सौख की जावे पर चढ़ेंगे ! जहिया कमाना तहिया अपना हेलीकॉप्टर किन लेना हमको उससे मतलब नहीं है ! साईकल से जो जहाँ जाना है !"
"हम ओतना नहीं जानते हैं.. इंटर के बाद साईकल से चले वाला लइकन मउगा कहलाता है ! हमको जावा बुक कर दीजिए नहीं त आज से इस घर में खाना त्यगते हैं हम !"
"इसको आज से खाना बंद करो.. देखते हैं कहाँ से जुड़ेगा इसको !"

मास्टर के घर में पैदा होना अपने आप में एक त्रासदी है.. बात नहीं बना ! मामा से बोले, मामा बढ़िया आदमी है - हमको तब ये ख्याल आया कि अच्छा आदमी बनने के लिए शिक्षक न होना अति आवश्यक है ! ममामा बोला कि हम देते हैं पैसा.. जाकर बुक करलो ! किसी से पाँच हज़ार व्यवस्था करो बाकी जब डिलीवरी होगा उसका पैसा हम देंगे !

मौसी-नानी-मम्मी का एक्के मत रहा !

"अरे गिर जाएगा, एक्सीडेंट हो जाएगा त का करेंगे हम !? अभी मोटरसाइकिल चलाने का उमर है ? नाना बहत्तर में नौकरी शुरू किए त अस्सी में राजदूत किनाया था - न नौकरी न चाकरी तेल कहाँ से भरवाओगे ?"

औरतों का घर में होना त्रासदी का क्यूब है। कोई नई चीज़ लेने से पहले इनकी राय एकदम न लें काहे से की ये सिर्फ़ राय देंगी.. पैसा नहीं ! रोहित सरदाना राय देगा, लेकिन मकबूज़ा कश्मीर में जाकर आतंकवाद पर रोक लगाने के लिए कुछ नहीं करेगा ! खैर, यहाँ भी बात नहीं बना..

फिर ढेर जाल बाँधे अंततः नाना पैसा दिए, जावा कल बुक हो गया है ! आपसे विनम्र आग्रह है कि इसपर नज़र न लगाएं अथवा आप अपनी मौत के खुद ज़िम्मेदार होंगे ! 😑

- जय हिंद / जय जावा ❤️