अभी रवीश कुमार के वॉल पर फरवरी की धूप के बारे में पढ़ रहे थे। 'फरवरी बिना बात किये गुज़ार देते हैं..' बढ़िया लगा पढ़ कर। लगा की उनके पास फरवरी की धूप देखने का कितना अलग नज़रिया है। दिल्ली, फरवरी, दोपहर, गर्लफ्रेंड, थेथरई सब है। लेकिन कमेंट सेक्शन में उदासी है। हर सुधीर का अर्णब आता है, कुणाल कुणाल की बात है.. हाहा..
मेरी फरवरी की दोपहर अलग होती है। इश्क़ हुआ, स्कूल के दिनों में तो सिर्फ यही होता रहा। जहानाबाद-पटना का समय इश्क़ करते-करते ही समाप्त हो गया.. लेकिन कभी फरवरी में रुमानवाद नहीं दिखा। हर तरफ सिर्फ उदासी.. रवीश जी के कमेंट सेक्शन के जैसी। फरवरी की धूप ज्यादा कुछ नहीं, मार्च की चिलचिलाती दोपहर से पहले की शाम मात्र-सी है। वेलेंटाइन फरवरी में नहीं होनी चाहिए। प्यार का मौसम है दशहरा से दीवाली के बीच का समय। एक हाथ से दुपट्टा संभालते आउ एक में पित्तल के लोटा में भर लोटा जल ले जा रही किसी कन्या के आगे-पीछे घूमिये - मंदिर में चिठ्ठी दीजिये - मेला में साथे चाट/फोकचा खाइए - बड़का नाव पर झुलिये, इत्यादि.. दीवाली की शाम को लंबका चाइनीज़ लड़ी भर पंजा में पकड़ कर गर्लफ़्रेंड साथे सेल्फी लीजिये। पटना के 'बाँसुरिवाला' या जहानाबाद के 'माँ तारा' रेस्टोरेंट में। उसी बीच कान/गर्दन चुम लीजिये, वहीं रेस्टोरेंट के 'कपल सेक्शन' में अपना रूमान शुरू।
"एहि लिए लाया हो तुम हमको हियाँ ?"
"ए प्रीति आज नहीं बोलो कुछ, अइसे छूछे खाली हाथ पकड़ के घूमे में का मज़ा है ?" हाहाहा.. अब न हुआ वेलेंटाइन ! फरवरी के धूप में कुछ नहीं होगा। भोरे-भोरे चार चप्पल से पिटाने पर तो कंबल छूटता है। ऐसे कहीं प्रेम निकलेगा ? फरवरी के धूप का आनंद इसमें है की भरल दुपहरिया में नहा धो कर - छत पर बड़का चटाई - उसपर गेंदरा - माय, मौसी, भाई, बहिन साथे स्टील के बड़का थाली में एक तरफ चावल एक तरफ कटहल का रसदार सब्जी, पापड़, तिलौरी इत्यादि के साथ कनैली के पौधा के पीछे धूप सेंकते हुए गबागब बड़का-बड़का कौर। तब तक में अल्टीमेटम आ जायेगा..
"अब चुप चाप पढ़े बइठ न त टंगरिया तोड़ देबउ!" हुएं कान में करुआ तेल डाल कर 'आरएस अग्रवाल' के किताब से एग्जाम्पल छापते रहिए। फिर वही फरवरी के धूप में आगे-पीछे का माहौल देखते हुए आँख पर गमछी रख के मार फोंफ, मार फोंफ.. मिज़ाज़ हरा हो जाएगा। इसके बाद शाम में जब मौसी पूछ देगी की 'टैन थीटा बाई कॉस थीटा क्या होता है" त मुँह फार दीजिये। अइसही मैट्रिक फेल नहीं होता है लइकन, मई-जून में होने वाले गृह प्रवेश का भूमि पूजन एहि फरवरी के दुपहरिया में होता है.. हाहाहा..
No comments:
Post a Comment