Monday, February 3, 2020

बिहार के दिसंबर में बहार है।


इस साल के दिसंबर की चौबीसवीं सुबह में, आलस्य की ऊनि चादर और कोहरे की धुंध के बीच सोया सूर्य भी आलसी हो चुका है।
जाड़े की सुबह हमेशा पसंदीदा रही है। लड़कपन में स्कूल जाने के लिए जूनियर वर्ग के लड़के जाड़े में फुल पैंट पहनते थे। दूसरे-तीसरे क्लास में दिसंबर के पहले हफ्ते का पहला दिन.. उजला-उजला पैंट मौसी माँ आयरन करके देती थीं। उजला जूता भी - बुधवार और शनिवार। जुम्मन चा का रिक्शा दुआर पर..
"मोहित बाबू, रिक्सा आ गया.."
दिसंबर में घर से सुबह-सुबह उजला-उजला कपड़ा पहन कर निकलने में एकदम लग्जरी लगता था। ये अंत तक रहा.. मतलब आठवां में बेल बॉटम पैंट के रिटायर होने पर एक शानदार पैंट सिलवाये थे - कमर से भी नीचे कर के पहनते थे। वो हनी सिंह का समय था और 'बैलून पैंट' फैशन में था। नौवां में थे.. फ्लोर पर मार्बल लगा हुआ था। शनिवार या बुधवार रहा होगा। मामा का स्पोर्ट्स शु पहन कर स्कूल गए.. मार्बल पर दौड़ कर ससरे तो सीधे 'B' सेक्शन के आगे रुके.. शैम्पू किया हुआ बाल था.. भोर का समय। बाल हवा में लहराया तो शाम में उसी सेक्शन की एक लड़की हमको फेसबुक पर कह दी कि
"जब आज तुम ससर कर गेट पर आये थे तो बड़े हैंडसम लग रहे थे"
बस। दसवाँ तक वही पैंट, वही शर्ट वैसा ही हेयर स्टाइल। वो बात अलग है कि वो लड़की बाद में मेरे बेंचमेट की गर्लफ्रेंड हो गयी थी।
समय बदला, जवान होने लगे.. जहानाबाद पीछे रह गया और हम पटना रहने लगे। दिसम्बर भी आया, सुबह भी आई। मामा 2009 के दिसंबर में पुर्तगाल जाने के लिए दिल्ली से एक जैकेट लिया था। जो 2017 के दिसंबर में उसकी बारात में खो गया। हमको वो जैकेट बड़ा पसंद था। हम माँग लिए थे। उस जैकेट का तारीफ सब कोई करता रहा। पटना के बोरिंग रोड में दिसंबर की सुबह-सुबह छे बजे फिजिक्स के क्लास जाने की एकमात्र वजह.. शानदार काला जैकेट - नीचे डेनिम - जूता - बाल हवा में लहरा रहा है - चेहरा पर कटिहार वाले राहुल से मांग के निविया का मॉस्चोराईज़र भी - फिर रोड पर हाथ को चिल्लम पीने के स्टाइल में करके उसमें मुँह से गर्म भाँप मारते हुए लड़की देखना। अहाहा.. परम आनंद।
पटना का बोरिंग रोड बिहार का फैशन हब है। आड़े-तिरछे बाल, बिना मोजा का जूता, लड़की हाफ पैंट में, लइकन फूल पैंट में। वन पीस, डंगरी इत्यादि में ये सुंदर-सुंदर लड़की की क्या बताएं ? दिनकर जी अगर आज के दिन में पटना विश्वविद्यालय के छात्र होते तो उर्वशी कोई आकाश की अप्सरा नहीं, बोरिंग रोड के गर्ल्स हॉस्टल की कोई लड़की होती। जो दिसंबर की शाम कृष्णापूरी पार्क के बाहर मोमोज़ खाती.. और हम रहते पुरुरवा, मोमोज़ का पईसा देते। हाहाहा..

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