Monday, February 3, 2020

तुम्हारे जैसी लड़कियाँ पेट में नहीं पलती होंगी।


"कैसे हो तुम मोही ?"
- सवाल ही गलत है तुम्हारा। मैं हूँ ही कहाँ ? मुझे हमारे बीच में बहुत अरसे से 'मैं' नहीं दिखा। तुम हो, सिर्फ तुम। जो तुम सोंच लो वही होना है। जो तुम कह दो, वही कानून है। तुम्हें 'अभी व्यस्त हैं' का अर्थ समझ नहीं आता। तुम्हें 'ना' सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम्हें लगता है कि तुम इश्क़ कर रही हो। मैं तो ख़ैर बस वक़्त ज़ाया कर रहा हूँ। इतने के बावजूद तुम नाराज़ होकर फ़ोन काट देती हो। सुनो, तुम अकारण ही उदास रहती हो। कितना कुछ तो है तुम्हारे पास खुश होने के लिए। तुम्हें मेरी क्या ही जरूरत है ? तुम्हें किसी की भी क्या जरूरत है ? तुम जैसी लड़कियों का नाम तो किसी वैसे पेड़ के नाम पर रखा जाना चाहिए जिनपर पतझड़ का प्रभाव न पड़ता हो। तुम्हारे जैसी लड़कियाँ पीपल की कोमल पत्तियों के बीच उगती होंगी। ऐसी कौन-से किस्म की माँ होती होंगी जो तुम जैसी लड़कियों को जन्म देती सकें ? मुझे तो नहीं लगता की तुम जन्मी भी हो। किन्हीं कारणों से ईश्वर को अवतार वाली प्रथा बंद करनी पड़ी इसलिए वे तुम जैसी लड़कियों को दरख़्तों पर उगाने लगे। आज का वनस्पति विज्ञान यह कभी नहीं जान पायेगा की इस सदी के पहले वर्ष के अगहन में पटना की किसी गाँव के बड़े से पीपल की कोमल पत्तियों के बीच एक सुंदर-सी 'नवउत्पन्न' लड़की को झूलता पाया गया। जिसका रंग हरा नहीं था। जिस कुल ने उस पेड़ को सालों पहले बोया था, वह लड़की उसी कुल में दे दी गयी। तब से गाँव के सारे लोग पीपल बोते रहते हैं। उन्हें लगता है कि किसी दिन तुम-सी एक लड़की उनके यहाँ भी आएगी।

"मैं ठीक हूँ। जानती हो ? मुझे बचपन से ही पीपल के पेड़ों के आस-पास जाने से रोका जाता रहा है।"
"आँ ? क्या ? क्या बोल रहे हो ?"
"कुछ नहीं। मैं अभी व्यस्त हूँ, फ़ोन रखता हूँ।"

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