भाषा या साहित्य का दिवस नहीं होता, उसकी सदी होती है.. काल होता है। हिंदी साहित्य को चार काल मिले..
वीरगाथा काल- भक्ति काल- रीतिकाल- आधुनिक काल।
आधुनिकता की चाटुकारिता की यह मिसाल है कि आज मेरे टाइमलाइन पर हिंदी दिवस के बारे में सिर्फ वही लिख रहे है जो हिंदी 'लिखते' हैं..
मैं हिंदी का भारत में दो रूप देखता हूँ- हिंदी बोली (तेरेको-मेरेको), और हिंदी लेखन (मैं-आप) !
कई हैं जो सिर्फ हिंदी बोलते हैं लेकिन लिखते नहीं..
जैसे उन्होंने सारे काम हिंदी में किये हैं, मेरे क्लास के कुछ लड़के गालियाँ हिंदी में देते थे लेकिन दंडस्वरूप उन्हें अगर स्कूल से सस्पेंड किया जाता तो वे इसकी माफी के लिए प्रधानाचार्य को जो पत्र लिखते, उसे
To,
The principal
से शुरू करते, वहीं अगर..
सेवा में,
प्राचार्य महोदय
लिखा होता तो आज हिंदी का ये हस्र नहीं होता !
कई हैं जो लिखते और बोलते दोनों हैं.. ये वही हैं जिन्हें इस भाषा की चिंता है, इसकी विवेचना के लिए समय है, इसके अस्तित्व को बनाये रखने की दृढ़ता है, जिनमें हिंदी का रक्त है, जो हिंदी को मात्र मैट्रिक इंटर की कहानियों तक ही सीमित नहीं रखे.. वहाँ से आगे लेकर चले.. हिंदी 'गंगास्तुति' से शुरू होकर.. 'उर्वशी' को प्रणाम करते सारे समाज को 'जुलूस' बनाते और अपने से उम्र में छोटी भाषाओं को 'गोदान' दे देते हुए जब यहाँ 'चौरासी' या 'अक्टूबर जंक्शन' पर भी पहुँचती है तब भी उसमें इतनी जान बच जाती है कि और असंख्य पीढ़ियों को अपने प्रकाश से उद्वेलित कर सके।
हिंदी का कोई छोर नहीं है.. यानी हिंदी यहाँ से शुरू हुई और बस यहीं तक गयी.. हिंदी को जितना बनना था बिगड़ना था वो बन बिगड़ चुकी है..
संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - हिंदी
मैं वो नहीं हूँ जो लिखूँ की "मैं अंग्रेजी का विद्रोह नहीं करता" मैं करता हूँ.. अंग्रेज़ी को इस राष्ट्र से हट जाना चाहिए.. और जर्मन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली भाषाओं की तरह 'फॉरेन लैंग्वेज' की श्रेणी में डाल देना चाहिए.. इसे उच्च विद्यालय तक तो पढ़ाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है.. भाषा के इस बदलाव से भारत में 'शिक्षित' और 'अशिक्षित' शब्द की नई व्याख्या/परिभाषा सामने आएगी ! सरकार को पहले भाषा और संस्कृति के छेत्र में काम करने की जरूरत है, मध्यस्थता और पारस्परिकता के संदर्भ में हिंदी सारगर्भित करना श्रेष्ठकर होगा !
- जय हिंदी, जय हिंदुस्तान 🙏
वीरगाथा काल- भक्ति काल- रीतिकाल- आधुनिक काल।
आधुनिकता की चाटुकारिता की यह मिसाल है कि आज मेरे टाइमलाइन पर हिंदी दिवस के बारे में सिर्फ वही लिख रहे है जो हिंदी 'लिखते' हैं..
मैं हिंदी का भारत में दो रूप देखता हूँ- हिंदी बोली (तेरेको-मेरेको), और हिंदी लेखन (मैं-आप) !
कई हैं जो सिर्फ हिंदी बोलते हैं लेकिन लिखते नहीं..
जैसे उन्होंने सारे काम हिंदी में किये हैं, मेरे क्लास के कुछ लड़के गालियाँ हिंदी में देते थे लेकिन दंडस्वरूप उन्हें अगर स्कूल से सस्पेंड किया जाता तो वे इसकी माफी के लिए प्रधानाचार्य को जो पत्र लिखते, उसे
To,
The principal
से शुरू करते, वहीं अगर..
सेवा में,
प्राचार्य महोदय
लिखा होता तो आज हिंदी का ये हस्र नहीं होता !
कई हैं जो लिखते और बोलते दोनों हैं.. ये वही हैं जिन्हें इस भाषा की चिंता है, इसकी विवेचना के लिए समय है, इसके अस्तित्व को बनाये रखने की दृढ़ता है, जिनमें हिंदी का रक्त है, जो हिंदी को मात्र मैट्रिक इंटर की कहानियों तक ही सीमित नहीं रखे.. वहाँ से आगे लेकर चले.. हिंदी 'गंगास्तुति' से शुरू होकर.. 'उर्वशी' को प्रणाम करते सारे समाज को 'जुलूस' बनाते और अपने से उम्र में छोटी भाषाओं को 'गोदान' दे देते हुए जब यहाँ 'चौरासी' या 'अक्टूबर जंक्शन' पर भी पहुँचती है तब भी उसमें इतनी जान बच जाती है कि और असंख्य पीढ़ियों को अपने प्रकाश से उद्वेलित कर सके।
हिंदी का कोई छोर नहीं है.. यानी हिंदी यहाँ से शुरू हुई और बस यहीं तक गयी.. हिंदी को जितना बनना था बिगड़ना था वो बन बिगड़ चुकी है..
संस्कृत - पालि - प्राकृत - अपभ्रंश - हिंदी
मैं वो नहीं हूँ जो लिखूँ की "मैं अंग्रेजी का विद्रोह नहीं करता" मैं करता हूँ.. अंग्रेज़ी को इस राष्ट्र से हट जाना चाहिए.. और जर्मन, फ्रांसीसी, पुर्तगाली भाषाओं की तरह 'फॉरेन लैंग्वेज' की श्रेणी में डाल देना चाहिए.. इसे उच्च विद्यालय तक तो पढ़ाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है.. भाषा के इस बदलाव से भारत में 'शिक्षित' और 'अशिक्षित' शब्द की नई व्याख्या/परिभाषा सामने आएगी ! सरकार को पहले भाषा और संस्कृति के छेत्र में काम करने की जरूरत है, मध्यस्थता और पारस्परिकता के संदर्भ में हिंदी सारगर्भित करना श्रेष्ठकर होगा !
- जय हिंदी, जय हिंदुस्तान 🙏

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